उत्तर प्रदेश: पुरुष नसबंदी तो कोई विकल्प ही नहीं

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पड़ोस की कुछ महिलाएं अब तक हमारे पास आ चुकी थीं. उनमें से एक 32 वर्षीय संध्या भी थीं, जो पिछले पांच सालों से मानवाधिकार जन निगरानी समिति की सदस्य हैं. संध्या बातचीत की शुरुआत अनीमिया की व्यापक समस्या से करती हैं. हालांकि, 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 ( एनएफएचएस-4 ) में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश की 52 प्रतिशत महिलाएं अनीमिया की शिकार हो सकती हैं. संध्या कहती हैं कि अनेई की शत-प्रतिशत महिलाएं मध्यम या तीव्र अनीमिया का शिकार हैं.
संध्या आगे कहती हैं, ''हमने हाल ही में इस गांव की सभी महिलाओं का पोषण-मानचित्रण [पोषण का मूल्यांकन] किया और पाया कि उनमें से किसी का भी हीमोग्लोबिन 10 ग्राम/डीएल से ऊपर नहीं है. उनमें से हर कोई अनीमिया का शिकार है. इसके अलावा, महिलाओं में ल्यूकोरिया और कैल्शियम की कमी दूसरी आम समस्याएं हैं.
स्वास्थ्य से जुड़े इन मुद्दों और कमियों के साथ-साथ, लोगों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भरोसा भी नहीं रहा है. स्वास्थ्य संस्थानों में उन्हें बहुत ही बदतर सेवाएं दी जाती हैं. इसलिए, जब तक कोई आपात स्थिति न हो, महिलाएं अस्पताल नहीं जाती हैं. सुदामा क्लिनिक में न जाने के अपने डर के बारे में बताती हैं, “मेरी पहली पांच डिलीवरी घर पर ही हुई थी. फिर आशा [मान्यताप्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता] ने मुझे अस्पताल ले जाना शुरू कर दिया.”
सुदामा की 47 वर्षीय पड़ोसी दुर्गामती आदिवासी कहती हैं, “डॉक्टर हमारे साथ भेदभाव करते हैं. लेकिन यह कोई नई बात नहीं है, और असली चुनौती घर से ही शुरू हो जाती है. हमें सरकार, डॉक्टर, और हमारे पति, सभी नीचा दिखाते हैं. वे [पुरुष] केवल शारीरिक सुख पाना जानते हैं, उसके बाद उन्हें कोई लेनादेना नहीं होता है. उन्हें लगता है कि सिर्फ़ परिवार का पेट भरना ही उनकी एकमात्र ज़िम्मेदारी है. बाक़ी सब काम हम महिलाओं के जिम्मे हैं.” यह कहते-कहते दुर्गामती व्याकुल हो उठती हैं.

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